March 28, 2026

Delhi High Court Divorce Ruling: One Year Separation Not Mandatory | Mutual Consent Divorce HMA 13B | तलाक के लिए एक साल अलग रहना जरूरी नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा- पति पत्नी को अनचाहे रिश्ते में उलझाए रखना गलत

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नई दिल्लीकुछ ही क्षण पहले

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दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को कहा कि आपसी सहमति से तलाक लेने वाले पति पत्नी के लिए एक साल तक अलग रहने की शर्त अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम (HMA), 1955 के तहत बनाए गए इस शर्त को सही मामलों में माफ किया जा सकता है।

कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसी परिस्थितियों में, पति-पत्नी को शादी के बंधन से मुक्त करने के बजाय, उन्हें एक गलत रिश्ते में उलझाए रखना गलत होगा। इससे दोनों पर अनावश्यक मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक तनाव पड़ेगा।

यह स्पष्टीकरण एक डिवीजन बेंच द्वारा किए गए एक रेफरेंस के जवाब में आया, जिसमें अधिनियम के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए याचिका पेश करने की समयसीमा पर मार्गदर्शन मांगा गया था।

जस्टिस नवीन चावला, अनूप जयराम भंभानी और रेनू भटनागर की तीन जजों की बेंच ने कहा कि HMA की धारा 13B(1) के तहत एक साल की अवधि के लिए अलग रहने की कानूनी शर्त सुझाव है, अनिवार्य नहीं।

कोर्ट ने पूछा-

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क्या कोई कोर्ट आपसी सहमति से तलाक को रोकने के लिए मजबूर है, जिससे अनिच्छुक पक्षों को वैवाहिक सुख में नहीं, बल्कि वैवाहिक खाई में धकेला जाए?

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सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया

सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए, बेंच ने कहा कि धारा 13B(1), जो इस अधिनियम के प्रावधानों के अधीन शब्दों से शुरू होती है, उसे HMA की धारा 14(1) की शर्तों के तहत ढंग से पढ़ा जाना चाहिए।

धारा 14(1) अदालतों को याचिकाकर्ता को “असाधारण कठिनाई” या प्रतिवादी की ओर से “असाधारण दुराचार” वाले मामलों में कानूनी प्रतीक्षा अवधि को माफ करने का अधिकार देती है।

कोर्ट ने तर्क दिया कि भले ही पति-पत्नी आपसी सहमति से तलाक के लिए कोर्ट आते हैं, लेकिन अलग होने का उनका फैसला निश्चित रूप से किसी कारण पर आधारित होता है।

शादी खत्म करने में देरी हो तो रिश्ता सुधारने का मौका नहीं मिल पाता

कोर्ट ने कहा कि कुछ मामलों में अगर शादी को खत्म करने में देरी होती है, तो पति या पत्नी में से एक या दोनों को आगे चलकर नया और स्थिर रिश्ता बनाने का मौका नहीं मिल पाता। इससे उनके दोबारा शादी करने और समाज में सामान्य जीवन जीने की संभावना पर स्थायी असर पड़ सकता है।

हाई कोर्ट की मुख्य बातें-

  • हिंदू विवाह अधिनियम (HMA) की धारा 13B(1) के तहत आपसी तलाक के लिए एक साल अलग-अलग रहने की जो शर्त है, उसे धारा 14(1) के प्रावधान का इस्तेमाल करके माफ किया जा सकता है।
  • लेकिन एक साल की इस अवधि की छूट मिलने का मतलब यह नहीं है कि धारा 13B(2) के तहत दूसरा आवेदन दाखिल करने से पहले की छह महीने की “कूलिंग-ऑफ” अवधि भी अपने आप माफ हो जाएगी। दोनों छूटों पर कोर्ट अलग-अलग फैसला करेगा।
  • अगर कोर्ट को लगे कि एक साल और छह महीने—दोनों ही इंतजार की अवधि माफ की जानी चाहिए, तो तलाक की डिक्री को लागू करने में देरी करना जरूरी नहीं है। ऐसी स्थिति में तलाक तुरंत प्रभावी हो सकता है।
  • यह छूट आम मामलों में नहीं दी जाएगी। इसे तभी दिया जाएगा जब कोर्ट को लगे कि याचिकाकर्ता को असाधारण कठिनाई हो रही है या प्रतिवादी की तरफ से गंभीर दुराचार हुआ है।
  • ऐसी छूट देने का अधिकार फैमिली कोर्ट और हाई कोर्ट दोनों के पास है।
  • अगर कोर्ट को पता चलता है कि एक साल की अवधि की छूट गलत जानकारी देकर या तथ्य छिपाकर ली गई है, तो वह तलाक के प्रभावी होने की तारीख आगे बढ़ा सकता है या किसी भी स्तर पर याचिका खारिज कर सकता है।
  • यह फैसला हिंदू विवाह अधिनियम में तय प्रतीक्षा अवधि को लेकर स्थिति साफ करता है और ऐसे मामलों में अदालतों को अधिक स्पष्ट अधिकार देता है, जहाँ शादी जारी रखने का कोई वास्तविक मतलब नहीं रह जाता।

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