March 26, 2026

India China Border Development Dispute; Galwan Valley Clash | Roads Airstrips | हिमालय तक सड़क, सुरंगें और एयरस्ट्रिप बना रहा भारत: अमेरिकी मीडिया का दावा- गलवान झड़प के बाद निर्माण; बॉर्डर तक हथियारों की पहुंच आसान होगी

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बीजिंग/ नई दिल्ली1 दिन पहले

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15 किमी लंबा यह प्रोजेक्ट लद्दाख में बॉर्डर चौकियों तक सामान पहुंचाने के सिस्टम को आसान बना देगा। - Dainik Bhaskar

15 किमी लंबा यह प्रोजेक्ट लद्दाख में बॉर्डर चौकियों तक सामान पहुंचाने के सिस्टम को आसान बना देगा।

भारत हिमालयी इलाके में चीन से होने वाली किसी भी संभावित झड़प से निपटने के लिए सड़कें, सुरंगें और हवाई पट्टियां बनाने पर करोड़ों रुपए खर्च कर रहा है। यह जानकारी अमेरिकी मीडिया वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट में सामने आई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 में चीन के साथ गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद इस कदम की शुरुआत हुई थी। उस झड़प ने 2200 मील लंबी बॉर्डर पर भारत की सामान पहुंचाने की व्यवस्था (लॉजिस्टिक्स) की बड़ी कमियों को उजागर किया था।

दशकों से चीन ने अपनी बॉर्डर पर रेल और सड़कों का विशाल नेटवर्क बनाया है। जबकि भारत अपने पहाड़ी सीमावर्ती इलाकों में सैनिकों को तेजी से पहुंचाने के लिए जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में पीछे रह गया।

भारत हिमालय क्षेत्र में सड़कें, सुरंगें और हवाई पट्टियां बना रहा है।

भारत हिमालय क्षेत्र में सड़कें, सुरंगें और हवाई पट्टियां बना रहा है।

चीन घंटों में मदद पहुंचाता है, भारत को हफ्ते लगते हैं

2020 की झड़प के दौरान, 14,000 फीट की ऊंचाई पर भारतीय और चीनी सैनिक डंडों और कांटेदार तारों से लिपटे क्लबों से हाथापाई कर रहे थे।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि चीन मजबूत कनेक्टिविटी की वजह से कुछ ही घंटों में मदद पहुंचा सकता था। जबकि भारत को उस इलाके की खराब या नहीं के बराबर सड़कों से एक्स्ट्रा सैनिकों को पहुंचाने में एक हफ्ते का समय लगता।

लद्दाख के उत्तरी क्षेत्र में पूर्व ऑपरेशनल लॉजिस्टिक्स प्रमुख मेजर जनरल अमृत पाल सिंह ने WSJ से कहा- इस घटना के बाद हमें अपनी पूरी रणनीति बदलने की जरूरत महसूस हुई।

लद्दाख की गलवान घाटी में 15 जून 2020 को भारत-चीन के सैनिकों के बीच हुई झड़प हुई थी। फाइल फोटो

लद्दाख की गलवान घाटी में 15 जून 2020 को भारत-चीन के सैनिकों के बीच हुई झड़प हुई थी। फाइल फोटो

11,500 फीट की ऊंचाई पर बन रही जोजिला सुरंग

भारत के नॉर्दर्न कमांड के पूर्व कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने WSJ को बताया कि इन प्रोजेक्ट मकसद ऊंचाई वाले सैन्य चौकियों को अलग-थलग पड़ी नागरिक बस्तियों से जोड़ना है।

खासकर उन जगहों को जो कड़ाके की सर्दी में कट जाती हैं। सबसे जरूरी प्रोजेक्ट में से एक जोजिला सुरंग है, जिसे उत्तरी भारत के पहाड़ों में लगभग 11,500 फीट की ऊंचाई पर बनाया जा रहा है।

यह प्रोजेक्ट 2020 संघर्ष के कुछ महीनों बाद शुरू हुआ। इसे 750 मिलियन डॉलर (6,734 करोड़ रुपए) से ज्यादा की लागत से बनाया जा रहा है। इसे 2028 तक पूरा करने का टारगेट रखा गया है।

सीमा चौकियों तक सामान पहुंचाना आसान हो जाएगा

जनरल दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा कि लगभग 9 मील (15 किमी) लंबा यह प्रोजेक्ट लद्दाख में बॉर्डर चौकियों तक सामान पहुंचाने के मुश्किल काम को आसान बना देगा। लद्दाख में भारी बर्फबारी के कारण ये चौकियां साल में 6 महीने तक सप्लाई लाइन से कटी रहती हैं।

फिलहाल सामान ट्रकों या ट्रेनों से जम्मू और कश्मीर के पड़ोसी डिपो तक पहुंचाया जाता है। वहां से सेना के काफिले उन्हें लद्दाख की राजधानी लेह तक ले जाते हैं।

लेह से छोटी गाड़ियां खराब रास्तों से गुजरती हैं और फिर पोर्टर (सामान ढोने वाले लोग) और खच्चर समुद्र तल से 20,000 फीट ऊपर तक जरूरी सामान पहुंचाते हैं।

3 घंटे का सफर 20 मिनट में पूरा होगा

हर सैनिक को हर महीने लगभग 220 पाउंड आपूर्ति की जरूरत होती है, जिसमें भोजन, कपड़े और टूथपेस्ट जैसी जरूरी चीजें शामिल हैं।

30 सैनिकों वाली एक चौकी में हर दिन लगभग 13 गैलन ईंधन की खपत होती है, जो किसी के कंधे पर चढ़ाकर ऊपर पहुंचाई जाती है।

जोजिला सुरंग सामान की आवाजाही आसान बनाएगी। इसके बनने से श्रीनगर और लद्दाख के बीच यात्रा का समय कुछ इलाकों में 3 घंटे से घटकर 20 मिनट हो जाएगा।

यहां एक बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती वर्कर्स और बाद में डीजल से चलने वाली सेना की ट्रकों के लिए पर्याप्त वेंटिलेशन (हवा का आना-जाना) बनाए रखना है। इस प्रोजेक्ट मे 1,000 से ज्यादा वर्कर्स काम कर रहे हैं।

गलवान घाटी संघर्ष के बाद चीन-भारत इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत कर रहे

2020 की झड़प के बाद से पैंगोंग त्सो झील पर तनाव बना हुआ है। 80 मील लंबी यह झील लद्दाख से चीन के तिब्बत तक फैली हुई है। दोनों देशों ने इस इलाके में सड़कों और इमारतों का निर्माण तेज कर दिया है।

ऑस्ट्रेलियाई स्ट्रेटेजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट की सीनियर फेलो राजेश्वरी पिल्लई राजगोपालन के मुताबिक, चीन ने पिछले साल झील के उत्तरी और दक्षिणी किनारों को जोड़ने वाले एक पुल का निर्माण पूरा किया है।

इससे सैनिकों को झील के चारों ओर लंबे रास्ते तय करने के बजाय सीधे पार करने की सुविधा मिली है।

भारत ने सीमा पर 30 से ज्यादा हेलीपैड बनाए हैं

भारत ने भी तट के साथ अपनी चौकियों का विस्तार किया और पास के ठिकानों में सड़कों को अपग्रेड किया। 2021 में झील पर सैनिकों को पीछे हटाने के समझौते के बावजूद, दोनों पक्ष वहां सैन्य मौजूदगी बनाए हुए हैं।

रक्षा मंत्रालय ने कंस्ट्रक्शन एजेंसी बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन का बजट इस साल 810 मिलियन डॉलर ( 7,274 करोड़ रुपए) तक बढ़ाया है, जो 2020 में 280 मिलियन डॉलर (2,514 करोड़ रुपए) था। इसी अवधि में भारत का कुल सैन्य खर्च लगभग 60% बढ़कर 80 बिलियन डॉलर (7.18 लाख करोड़ रुपए) हो गया।

एजेंसी ने पहले ही सीमा पर हजारों मील नई सड़कें बना ली हैं। भारत ने सीमा पर 30 से अधिक हेलीपैड बनाए हैं और कई हवाई पट्टियों को अपग्रेड और नया बनाया है।

लगभग 14,000 फीट पर लद्दाख में नया मुध-न्योमा वायु सेना बेस बना है। यह चीन की सीमा से महज 19 मील दूर है।

यह बेस भारत के भारी सैन्य परिवहन विमानों जैसे अमेरिकी C-130J के लिए बनाया गया है। यह बेस सीमा क्षेत्रों की ओर जाने वाले सैनिकों और उपकरणों के लिए स्टेजिंग ग्राउंड के रूप में काम करेगा।

रिपोर्ट- भारत हिमालय को सुरक्षा कवच मानता था

रिपोर्ट के मुताबिक दशकों से भारत ने अपनी सीमा के ज्यादातर हिस्से पर बड़े कंस्ट्रक्शन परहेज किया। भारत का मानना था कि ऊंचे हिमालय और सड़कों की कमी चीनी घुसपैठ को आने से रोकेंगे। यह उसके सुरक्षा कवच हैं।

वाशिंगटन थिंक टैंक स्टिमसन सेंटर के सीनियर फेलो डैनियल मार्की ने कहा- यह चीनी आक्रमण के लिए लाल कालीन बिछाने जैसा था। भारतीय सोचते थे कि सड़कें बनाना उनके लिए खतरनाक हो सकता था।

2000 के मध्य तक नई दिल्ली ने देखा कि चीन अपनी सीमाओं को मजबूत करने और झिंजियांग और तिब्बत के आसपास हजारों मील सड़कें और रेलवे बना रहा है। इसके बाद भारत भी निर्माण कार्य में तेजी लेकर आया।

हिमालय भारत के लगभग 13 क्षेत्रों (11 राज्य + 2 केंद्र शासित प्रदेश) को कवर करता है, जो भारतीय हिमालयी क्षेत्र (IHR) के रूप में जाने जाता है।

हिमालय भारत के लगभग 13 क्षेत्रों (11 राज्य + 2 केंद्र शासित प्रदेश) को कवर करता है, जो भारतीय हिमालयी क्षेत्र (IHR) के रूप में जाने जाता है।

गलवान घाटी में झड़प के बाद बिगड़े थे रिश्ते

15 जून 2020 को चीन ने ईस्टर्न लद्दाख के सीमावर्ती इलाकों में एक्सरसाइज के बहाने सैनिकों को जमा किया था। इसके बाद कई जगह पर घुसपैठ की घटनाएं हुई थीं।

भारत सरकार ने भी इस इलाके में चीन के बराबर संख्या में सैनिक तैनात कर दिए थे। हालात इतने खराब हो गए कि वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर गोलियां चलीं।

इसी दौरान 15 जून को गलवान घाटी में चीनी सेना के साथ हुई झड़प में 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। बाद में भारत ने भी इसका मुंहतोड़ जवाब दिया था। इसमें 40 चीनी सैनिक मारे गए थे।

इसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में बड़ा तनाव देखने को मिला था। अक्टूबर 2024 में भारत और चीन ने LAC पर बचे हुए टकराव वाले इलाकों से पीछे हटने पर सहमति जताई थी।

यह तस्वीर 2020 गलवान झड़प के बाद की है, जब समझौते के तहत चीन के टैंक LAC से पीछे हटे थे।

यह तस्वीर 2020 गलवान झड़प के बाद की है, जब समझौते के तहत चीन के टैंक LAC से पीछे हटे थे।

दूसरे देशों में मिलिट्री बेस बनाना चाहता है चीन

चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) बांग्लादेश और पाकिस्तान समेत दुनिया के 21 देशों में नए मिलिट्री बेस बनाने की योजना पर काम कर रही है। इनका मकसद चीन की नेवी और एयरफोर्स को दूर देशों तक ऑपरेशन करने में मदद देना और वहां आर्मी तैनात करना है।

यह जानकारी अमेरिकी डिफेंस डिपार्टमेंट ‘पेंटागन’ की रिपोर्ट में सामने आई है। PLA की सबसे ज्यादा दिलचस्पी उन इलाकों में है, जहां से दुनिया का अहम समुद्री व्यापार गुजरता है, जैसे मलक्का स्ट्रेट, होरमुज स्ट्रेट और अफ्रीका व मिडिल ईस्ट के कुछ स्ट्रैटेजिक पाइंट्स।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, चीन के ये विदेशी सैन्य ठिकाने सिर्फ सैन्य मदद के लिए नहीं, बल्कि खुफिया जानकारी जुटाने के लिए भी इस्तेमाल हो सकते हैं। ऐसा लॉजिस्टिक नेटवर्क अमेरिका और उसके सहयोगी देशों की सेनाओं की एक्टिविटी पर नजर रखने में मदद कर सकता है।

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