March 26, 2026

टेक्सास में स्कूलों की पहल:छात्रों की घर से जुड़ी समस्याएं दूर कीं; ऐसे बच्चों के नंबर बढ़े, ड्रॉपआउट घटा, अच्छी नौकरी भी ​हासिल की

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अमेरिका के टेक्सास प्रांत में सैन मार्कोस के ओवेन गुडनाइट मिडिल स्कूल में ठंडी सुबह है। गाइडेंस काउंसलर टेरेसा रिवास एक बच्चे के लिए मोटा, वाटरप्रूफ जैकेट चुन रही हैं। वह सिर्फ रिपोर्ट कार्ड नहीं देखतीं, यह भी देखती हैं कि बच्चों के घर का फ्रिज भरा है या नहीं, किराया जमा है या नहीं, इलाज कराने के पैसे हैं या नहीं। रिवास कम्युनिटीज इन स्कूल्स (सीआईएस) की ‘नेविगेटर’ हैं। ‘कम्युनिटी स्कूल मॉडल’ ने साबित किया कि शिक्षा सुधार कक्षा से बाहर, जिंदगी के सहारे से शुरू होता है। विचार यह है कि अगर बच्चा घर पर संघर्ष कर रहा हो- गरीबी, हिंसा, मानसिक तनाव और बेघर हो तो पढ़ाई में रुचि नहीं हो सकती है। कम्युनिटी स्कूलों में काउंसलर/नेविगेटर बच्चों की पढ़ाई के साथ घर-परिवार, स्वास्थ्य, मानसिक तनाव और आर्थिक संकट पर काम करते हैं। सरकारी योजनाओं से जोड़ना, किराया-इलाज में मदद, भोजन की व्यवस्था- ये सब पढ़ाई का हिस्सा बन जाते हैं। हार्वर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ एजुकेशन के रॉब वॉटसन बताते हैं, ‘12वीं तक बच्चे अपना सिर्फ 20% समय कक्षा में बिताते हैं। अगर उनकी पढ़ाई सुधारनी है, तो बाकी 80% जिंदगी को भी देखना होगा।’ स्कूल प्रिंसिपल जो मिशेल कहते हैं, ‘कई बच्चों के लिए घर की हालत उनकी परीक्षा से भी ज्यादा बड़ी चुनौती होती है।’ कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्री बेंजामिन गोल्डमैन और हार्वर्ड की शोधकर्ता जेमी ग्रेसी ने टेक्सास 1.6 करोड़ छात्रों का दो दशकों तक अध्ययन किया। उन्होंने जनगणना ब्यूरो और शिक्षा रिकॉर्ड्स का विश्लेषण किया। इसके चौंकाने वाले नतीजे सामने आए। सीआईएस के बच्चों के टेस्ट स्कोर बढ़े। गैरहाजिरी और निलंबन घटे, हाई-स्कूल ग्रेजुएशन 5.2% बढ़ा। दो-वर्षीय कॉलेज में दाखिला 9.1% बढ़ा। अच्छी नौकरियां हासिल की। 27 साल की उम्र में सीआईएस स्कूलों के छात्र सालाना ₹95,000 रु. से ज्यादा कमाने लगे। स्कूल सामाजिक सहारे का केंद्र बनें, तो पढ़ाई में सुधार यूनिसेफ और विश्व बैंक की रिपोर्टों से पता चला है कि गरीबी, पोषण और मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा पर गहरा असर डालते हैं। अगर स्कूल सामाजिक सहारे का केंद्र बनें, तो ड्रॉपआउट घटाने और सीखने के स्तर सुधारने में बड़ी छलांग संभव है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय में पोस्टडॉक्टोरल फेलो जेमी ग्रेसी के अनुसार, सीआईएस पर करीब 90 हजार रु. खर्च करने से 27 वर्ष की उम्र में छात्रों की आय में 36 हजार रु. से ज्यादा बढ़ी पाई गई। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि सीआईएस में प्रत्येक 2.71 लाख रु. के निवेश से आयकर राजस्व में 6.34 लाख रु. की बढ़ोतरी होगी।



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