March 27, 2026

Donald Trump WEF 2026 Speech Update; US Greenland Row

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जेनेवा1 घंटे पहले

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ट्रम्प के एयरफोर्स वन प्लेन को तकनीकी खराबी के चलते लौटना पड़ा। (फाइल फोटो) - Dainik Bhaskar

ट्रम्प के एयरफोर्स वन प्लेन को तकनीकी खराबी के चलते लौटना पड़ा। (फाइल फोटो)

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के विमान में तकनीकी खराबी की वजह से उसे रास्ते में यूटर्न लेना पड़ा। व्हाइट हाउस के मुताबिक, टेकऑफ के बाद क्रू को एक मामूली इलेक्ट्रिकल खराबी का पता चला था, जिसके बाद वे वॉशिंगटन लौट आए।

ट्रम्प आज सुबह स्विट्जरलैंड के दावोस के लिए रवाना हुए थे। वे यहां वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) की बैठक में शामिल होंगे और अपनी ग्रीनलैंड पॉलिसी पर भाषण देंगे।

फ्लाइट ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, विमान ने न्यूयॉर्क के लॉन्ग आइलैंड के पास अटलांटिक महासागर के ऊपर उड़ान भरने के लगभग एक घंटे बाद वापस मुड़ने का फैसला किया। इसके बाद एयर फोर्स वन सुबह करीब 9:30 बजे मैरीलैंड में सुरक्षित उतरा।

विमान उतरने के लगभग एक घंटे बाद ट्रम्प दूसरे विमान से दावोस के लिए रवाना हो गए। इस दूसरे विमान को भी एयर फोर्स वन के तौर पर ही इस्तेमाल किया जाता है।

एयरफोर्स वन टेक ऑफ के करीब 1 घंटे बाद ही वॉशिंगटन डीसी लौट आया।

एयरफोर्स वन टेक ऑफ के करीब 1 घंटे बाद ही वॉशिंगटन डीसी लौट आया।

चार दशक पुराने प्लेन का इस्तेमाल कर रहे ट्रम्प

ट्रम्प की आधिकारिक यात्राओं के लिए फिलहाल बोइंग 747-200B का एयर फोर्स वन के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। इस बेड़े में ऐसे दो विमान हैं, जो करीब चार दशक पुराने हैं। अमेरिकी विमान निर्माता बोइंग इनके नए विकल्प तैयार कर रहा है, लेकिन इस प्रोजेक्ट में देरी हो रही है।

पिछले साल कतर के शाही परिवार ने ट्रम्प को एक लग्जरी बोइंग 747-8 जंबो जेट दिया था, जिसे एयर फोर्स वन फ्लीट में शामिल किया जाना है। इस फैसले पर काफी सवाल उठे थे। फिलहाल उस विमान को सुरक्षा मानकों के मुताबिक तैयार किया जा रहा है।

ग्रीनलैंड पर अपना एजेंडा बताने दावोस जा रहे ट्रम्प

राष्ट्रपति ट्रम्प दावोस जा रहे हैं। वे ग्रीनलैंड का भविष्य तय करने के एजेंडे के साथ बुधवार शाम करीब 7 बजे दुनिया को संबोधित करेंगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रम्प का यह भाषण ऐसे वक्त पर हो रहा है जब दुनियाभर में राजनीतिक तनाव, व्यापार युद्ध और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे तेजी से गहराते जा रहे हैं। यही वजह है कि दावोस में ट्रम्प की मौजूदगी और उनके हर बयान पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।

डोनाल्ड ट्रम्प WEF में भाषण देने के बाद एक खास उच्चस्तरीय कार्यक्रम की मेजबानी भी करेंगे। इस कार्यक्रम में भारत के 7 बड़े कारोबारी नेताओं को आमंत्रित किया गया है।

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 की खास बातें…

  • डोनाल्ड ट्रम्प अपने साथ अमेरिका की अब तक की सबसे बड़ी टीम लेकर आ रहे हैं, जिसमें पांच कैबिनेट मंत्री शामिल हैं।
  • दावोस में पहली बार अमेरिका के लिए एक अलग ‘USA हाउस’ बनाया गया है।
  • वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मुताबिक कम से कम 64 देशों के राष्ट्राध्यक्ष या सरकार प्रमुख इस बैठक में शामिल होंगे।
  • पाकिस्तान पहली बार दावोस में ‘सूफी नाइट’ का आयोजन करेगा, जिसमें सिंधु घाटी के पारंपरिक खाने परोसे जाएंगे।
  • इस साल 130 से ज्यादा देशों के 3,000 से ज्यादा प्रतिनिधि बैठक में हिस्सा ले रहे हैं। इनमें 1,700 से ज्यादा कारोबारी हैं, जिनमें से आधे से ज्यादा CEO या चेयरमैन हैं।
  • करीब 400 बड़े राजनीतिक नेता भी इस बैठक में मौजूद रहेंगे। इनमें 30 से ज्यादा विदेश मंत्री, 60 से ज्यादा वित्त मंत्री और 30 से ज्यादा व्यापार मंत्री हैं।
  • भारत से चार केंद्रीय मंत्री और छह राज्यों के मुख्यमंत्री भी बैठक में हिस्सा लेंगे। 100 से ज्यादा भारतीय कारोबारी भी दावोस में मौजूद रहेंगे।

ट्रम्प 6 साल बाद दावोस में भाषण देंगे

दुनिया की सरकारें और कंपनियां सप्लाई चेन, तकनीक और निवेश पर नए सिरे से फैसले ले रही हैं। इसी बीच अमेरिका-भारत के नए व्यापार समझौते पर बातचीत चल रही है, इसलिए ट्रम्प के कार्यक्रमों में भारतीय कंपनियों की मौजूदगी पर सबकी नजर है।

डोनाल्ड ट्रम्प करीब छह साल बाद दावोस लौटे हैं। इससे पहले उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में 21 जनवरी 2020 को दावोस में भाषण दिया था। इस बार उनका दौरा और ज्यादा अहम माना जा रहा है, क्योंकि अमेरिका की विदेश और व्यापार नीति में आक्रामक बदलाव साफतौर पर दिख रहे हैं।

ट्रम्प के सलाहकारों का कहना है कि वह दावोस में यह साफ कर देंगे कि अमेरिका अब पुराने ग्लोबल सिस्टम और नियमों से आगे बढ़ चुका है।

ट्रम्प ग्रीनलैंड को लेकर आक्रमक रुख दिखा रहे हैं

ग्रीनलैंड को लेकर ट्रम्प का रुख लगातार सख्त होता जा रहा है। ट्रम्प इसे अमेरिका की सुरक्षा और रणनीतिक ताकत से जोड़कर देख रहे हैं। उनका मानना है कि आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियों, खनिज संसाधनों और सैन्य अहमियत के चलते ग्रीनलैंड पर अमेरिका का प्रभाव होना जरूरी है।

ट्रम्प ने मंगलवार को सोशल मीडिया पर एक मैप शेयर किया था, जिसमें ग्रीनलैंड, कनाडा और वेनेजुएला को अमेरिका का हिस्सा दिखाया गया था।

ग्रीनलैंड विवाद के साथ-साथ ट्रम्प ने यूरोप और बाकी दुनिया को टैरिफ को लेकर भी साफ चेतावनी दी है। अमेरिका ने डेनमार्क, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी समेत आठ यूरोपीय देशों पर 10% टैरिफ लगाया है।

अमेरिकी प्रशासन ने संकेत दिए हैं कि अगर विरोध जारी रहा तो यह टैरिफ 25% तक बढ़ाया जा सकता है। ट्रम्प की नीति साफ है कि व्यापार को अब कूटनीति और दबाव बनाने के हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा।

ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया ट्रुथ पर यह फोटो पोस्ट किया। इसमें पीछे बोर्ड पर नक्शा नजर आ रहा है। इसमें कनाडा और ग्रीनलैंड को अमेरिकी मैप में शामिल दिखाया गया है।

ट्रम्प ने अपने सोशल मीडिया ट्रुथ पर यह फोटो पोस्ट किया। इसमें पीछे बोर्ड पर नक्शा नजर आ रहा है। इसमें कनाडा और ग्रीनलैंड को अमेरिकी मैप में शामिल दिखाया गया है।

ट्रम्प NATO और चीन-रूस पर बयान दे सकते हैं

ट्रम्प NATO देशों पर भी लगातार दबाव बना रहे हैं। उनका कहना है कि अमेरिका अकेले वैश्विक सुरक्षा का खर्च नहीं उठा सकता। वह चाहते हैं कि यूरोपीय देश अपने रक्षा बजट में बढ़ोतरी करें। दावोस में ट्रम्प यह संदेश दोहरा सकते हैं कि सहयोग तभी मिलेगा जब जिम्मेदारी बराबरी की होगी।

चीन और रूस को लेकर भी ट्रम्प का रुख बेहद सख्त है। अमेरिका चीन को व्यापार, तकनीक और वैश्विक प्रभाव के मामले में सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी मानता है। वहीं रूस को लेकर भी अमेरिका की नीति टकराव वाली बनी हुई है। दावोस में ट्रम्प का भाषण इन दोनों देशों के लिए भी अहम माना जा रहा है।

वेनेजुएला में ट्रम्प के बढ़ते दखल से कई देश परेशान

साउथ अमेरिका में अमेरिका की बढ़ती दखलअंदाजी भी दुनिया की चिंता का विषय बनी हुई है। हाल ही में वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य कार्रवाई ने पूरे लैटिन अमेरिका में अस्थिरता बढ़ा दी है। ट्रम्प प्रशासन इसे क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी कदम बता रहा है, लेकिन कई देश इसे अमेरिका की दबंग नीति मान रहे हैं।

यूरोपीय नेताओं की प्रतिक्रिया भी लगातार तीखी होती जा रही है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों समेत कई नेताओं ने ट्रम्प की नीतियों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि इस तरह की नीतियां वैश्विक स्थिरता को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसके बावजूद ट्रम्प अपने फैसलों पर डटे हुए हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इन सबका असर सीधे ग्लोबल मार्केट और निवेश पर पड़ रहा है। दावोस पहुंचे कारोबारी नेताओं का मानना है कि अब जियोपॉलिटिक्स सिर्फ बैकग्राउंड रिस्क नहीं रही, बल्कि निवेश और बिजनेस फैसलों का सबसे बड़ा फैक्टर बन चुकी है। सप्लाई चेन, टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप और नए निवेश पर फैसले अब राजनीति को देखकर लिए जा रहे हैं।

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 क्यों खास है

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 का आयोजन 19 से 23 जनवरी तक स्विट्जरलैंड के दावोस में हो रहा है। इस साल की बैठक का थीम है ‘A Spirit of Dialogue’ यानी ‘संवाद की भावना’।

इस बैठक में 130 से ज्यादा देशों के करीब 3,000 प्रतिनिधि शामिल हो रहे हैं। इनमें 60 से ज्यादा देशों के राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख, G7 देशों के नेता, करीब 850 बड़े CEOs और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के प्रमुख शामिल हैं।

इस साल WEF की चर्चा इसलिए ज्यादा है क्योंकि दुनिया एक साथ कई संकटों से गुजर रही है। युद्ध, टैरिफ वॉर, वैश्विक मंदी की आशंका, जलवायु संकट और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे तकनीकी बदलावों ने सरकारों और कंपनियों दोनों को नए फैसले लेने पर मजबूर कर दिया है।

दावोस को इसलिए अहम माना जाता है क्योंकि यहां होने वाली बातचीत और बैठकों का असर आने वाले सालों की वैश्विक नीति और बाजारों पर साफ दिखाई देता है।

भारत और ग्लोबल साउथ देशों के लिए भी यह मंच बेहद जरूरी है, क्योंकि यहां निवेश, सप्लाई चेन और विकास से जुड़े बड़े फैसलों पर चर्चा होती है। दावोस में भारत की बढ़ती मौजूदगी यह दिखाती है कि वैश्विक ताकत का संतुलन धीरे-धीरे बदल रहा है।

WEF 2026 भारत के लिए अहम क्यों

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2026 भारत के लिए काफी अहम है। इस मंच पर भारत अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था, निवेश के मौके और भविष्य की योजनाओं को दुनिया के सामने रख रहा है। सरकार और उद्योग जगत के बड़े नेता यहां एक साथ पहुंचकर भारत को निवेश और साझेदारी के लिए आकर्षक देश के तौर पर पेश कर रहे हैं।

WEF 2026 में भारत से जुड़ी अहम बातें

• WEF 2026 में भारत का बड़ा प्रतिनिधिमंडल शामिल हो रहा है। • भारत से 80 से ज्यादा बड़े उद्योगपति, सीईओ और सीनियर नेता दावोस पहुंचे हैं। • भारत निवेश, मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी और डिजिटल विकास पर जोर दे रहा है। • विदेशी कंपनियों और निवेशकों के साथ भारत साझेदारी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। • भारत अपनी तेज आर्थिक वृद्धि और भविष्य की योजनाओं को वैश्विक मंच पर रख रहा है।

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