March 27, 2026

Mohan Bhagwat said: The era of confining women to the home is over. | भागवत बोले, बेटी बहकावे में कैसे आती है, परिवार सोचें: भोपाल में स्त्री शक्ति संवाद में कहा- परिवारों में चर्चा होगी तब रुकेगा लव जिहाद – Bhopal News

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डॉ. मोहन भागवत भोपाल में स्त्री शक्ति संवाद में संबोधित कर रहे थे।

भोपाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि “लव जिहाद पर रोकथाम की शुरुआत परिवार से होनी चाहिए और यह सोचने की जरूरत है कि बेटी बहकावे में कैसे आ जाती है।” उन्होंने परिवारों को आत्ममंथन करने और अपने घर में लगातार संवाद कायम रखन

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भागवत ने ‘स्त्री शक्ति संवाद’ में कहा कि परिवार और समाज में महिलाओं की भूमिका केंद्रीय है। बेटियों को सावधानी और आत्मरक्षा के संस्कार देना, परिवार में खुला संवाद रखना और अपराधियों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई करना बेहद जरूरी है।

भोपाल के शिवनेरी भवन में आयोजित ‘स्त्री शक्ति संवाद’ कार्यक्रम में शनिवार को भागवत ने कहा कि स्त्री और पुरुष श्रेष्ठता की तुलना व्यर्थ है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। प्रकृति और पुरुष के संयोग से ही सृष्टि संभव है, अलग-अलग रहकर कोई भी पूर्ण नहीं हो सकता है।

स्त्री शक्ति संवाद को संबोधित करते संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत।

स्त्री शक्ति संवाद को संबोधित करते संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत।

ये भी बोले भागवत

  • महिला ही समाज की शिल्पकार: संघ प्रमुख ने कहा कि बच्चों के संस्कारों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी मां की होती है। गृहिणी के बिना घर की कल्पना भी संभव नहीं है। महिलाएं जोड़ती हैं, संभालती हैं और परिवार में संतुलन बनाए रखती हैं।
  • पश्चिमीकरण की अंधी दौड़ पर सवाल: भागवत ने कहा कि आधुनिकता के नाम पर पश्चिमी जीवनशैली की अंधी नकल खतरनाक है। भारतीय परंपरा में नारी का स्थान मातृत्व से और अधिक ऊंचा होता है। उन्होंने रानी लक्ष्मीबाई का उदाहरण देते हुए कहा कि भारतीय नारी ने हर काल में शक्ति और साहस का परिचय दिया है।
  • मानसिक तनाव और आत्महत्या पर भी चिंता: उन्होंने कहा कि घर में कोई भी व्यक्ति अकेला महसूस न करे, यह बेहद जरूरी है। संवाद की कमी और असंभव अपेक्षाएं मानसिक तनाव को जन्म देती हैं। बच्चों पर लक्ष्य थोपने के बजाय उनकी रुचियों को समझना जरूरी है। जीवन में केवल सफलता नहीं, जीवन की सार्थकता अधिक महत्वपूर्ण है।
  • मातृशक्ति के बिना राष्ट्र निर्माण अधूरा: भागवत ने कहा कि देश की लगभग आधी आबादी महिलाएं हैं, लेकिन बड़ी संख्या अब भी सामाजिक और राष्ट्रीय भूमिका से पूरी तरह नहीं जुड़ी है। ऐसी महिलाओं के प्रबोधन के लिए विशेष प्रयास जरूरी हैं। जहां नारी का सम्मान सुरक्षित होता है, वहीं समाज स्वतः स्वस्थ रहता है कि यही “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” का सार है।

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