Sharjeel imam Umar Khalid, 2020 Delhi Riots | Supreme Court Verdict | दिल्ली दंगा केस में उमर खालिद-शरजील को जमानत नहीं मिली: सुप्रीम कोर्ट ने एक साल अपील करने पर रोक लगाई, 5 आरोपियों को बेल
नई दिल्ली3 मिनट पहले
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दिल्ली दंगे मामले में शरजील 28 जनवरी, 2020 से जेल में है। उमर 13 सितंबर, 2020 से हिरासत में हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया। हालांकि 5 अन्य आरोपियों को 12 शर्तों के साथ जमानत दे दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उमर और शरजील एक साल तक इस मामले में जमानत याचिका दाखिल नहीं कर सकते हैं।
दरअसल, उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद दिल्ली दंगों के आरोप में 5 साल 3 महीने से तिहाड़ में बंद थे। इन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े मामले में उन्हें गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत जमानत देने से इनकार किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने आज कहा, ‘अनुच्छेद 21 संवैधानिक व्यवस्था में एक खास जगह रखता है। ट्रायल से पहले जेल को सजा नहीं माना जा सकता। स्वतंत्रता से वंचित करना मनमाना नहीं होगा। UAPA एक खास कानून के तौर पर उन शर्तों के बारे में एक कानूनी फैसला दिखाता है जिनके आधार पर ट्रायल से पहले जमानत दी जा सकती है।’

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की बड़ी बातें
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद और जस्टिस एनवी अंजारिया ने फैसला सुनाया।
- अदालत ने कहा कि अभियोजन और सबूतों, दोनों के लिहाज से उमर खालिद और शरजील इमाम की स्थिति अन्य 5 आरोपियों की तुलना में अलग है। कथित अपराधों में इन दोनों की भूमिका केंद्रीय (मुख्य) रही है। इन दोनों की हिरासत (ज्यूडिशियल कस्टडी) की अवधि भले ही लंबी रही हो, लेकिन यह न तो संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन करती है और न ही संबंधित कानूनों के तहत लगे वैधानिक प्रतिबंधों को निष्प्रभावी करती है।
- बहस के दौरान लंबे समय तक जेल में रहने और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वतंत्रता के बारे में दलीलें दी गईं। यह कोर्ट संविधान और कानून के बीच अमूर्त तुलना नहीं कर रहा है। अनुच्छेद 21 संवैधानिक व्यवस्था में एक खास जगह रखता है। ट्रायल से पहले जेल को सजा नहीं माना जा सकता। स्वतंत्रता से वंचित करना मनमाना नहीं होगा।
- UAPA एक खास कानून के तौर पर उन शर्तों के बारे में एक कानूनी फैसला दिखाता है जिनके आधार पर ट्रायल से पहले जमानत दी जा सकती है।राज्य की सुरक्षा और अखंडता से जुड़े अपराधों का आरोप लगाने वाले मुकदमों में देरी तुरुप का पत्ता नहीं हो सकती।
- 5 अन्य आरोपियों गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, मोहम्मद समीर खान, शादाब अहमद और शिफाउर रहमान को जमानत मिलने से उनके खिलाफ लगे आरोपों में कोई नरमी नहीं आती। उन्हें करीब 12 शर्तों के अधीन जमानत पर रिहा किया जाएगा। यदि शर्तों का उल्लंघन होता है, तो ट्रायल कोर्ट आरोपियों की सुनवाई के बाद जमानत रद्द करने के लिए स्वतंत्र होगा।


आरोपी बोले- दंगे भड़काने से जुड़ा कोई सबूत नहीं
आरोपियों की दलील है कि मामले में लंबे समय से सुनवाई शुरू नहीं हुई है और ट्रायल शुरू होने की संभावना भी कम है। यह भी कहा गया कि वे पांच साल से अधिक समय से जेल में हैं और अब तक उनके खिलाफ दंगे भड़काने से जुड़ा कोई ठोस सबूत सामने नहीं आया है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने 2 सितंबर, 2025 को आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज की थीं। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि प्रारंभिक तौर पर शरजील और उमर की भूमिका गंभीर लग रही है। उन पर सांप्रदायिक आधार पर भड़काऊ भाषण देकर भीड़ को उकसाने के भी आरोप हैं।
दिल्ली पुलिस बोली- आरोपी सुनवाई में देरी के लिए खुद जिम्मेदार
दिल्ली में फरवरी, 2020 में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के विरोध के दौरान हिंसा भड़की थी। इसमें 53 लोगों की मौत हुई थी। 250 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। 750 से ज्यादा FIR दर्ज की गईं।
दिल्ली पुलिस ने दंगे भड़काने के आरोप में शरजील और उमर को UAPA के तहत गिरफ्तार किया था। शरजील इमाम को दंगों से छह सप्ताह पहले, 28 जनवरी 2020 को गिरफ्तार किया गया था। उमर खालिद 13 सितंबर, 2020 से हिरासत में हैं।
दिल्ली पुलिस ने इनकी जमानत याचिकाओं का विरोध किया है। पुलिस का कहना है कि ये दिल्ली में दंगे भड़काने के मुख्य साजिशकर्ता थे। पुलिस ने कहा है कि सुनवाई में देरी के लिए आरोपी खुद जिम्मेदार हैं और अगर आरोपियों ने मदद की तो ट्रायल दो साल में पूरा किया जा सकता है।
पुलिस का दावा- ट्रम्प की यात्रा के समय दंगे करवाना चाहते थे आरोपी
पुलिस के मुताबिक, दंगे अचानक नहीं हुए, बल्कि यह पैन-इंडिया स्तर पर (पूरे भारत में) रची गई साजिश थीं, जिनका मकसद ‘सत्ता परिवर्तन’ और ‘आर्थिक दबाव’ बनाना था। पुलिस के अनुसार, CAA को ‘शांतिपूर्ण विरोध’ के नाम पर कट्टरपंथीकरण का जरिया बनाया गया।
दिल्ली पुलिस ने यह भी कहा कि साजिश को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा के समय अंजाम देने की योजना थी, ताकि अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान भारत की खींचा जा सके और नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के मुद्दे को वैश्विक स्तर पर उठाया जा सके।
पुलिस ने दावा किया कि इस साजिश को देशभर में दोहराने की कोशिश की गई। इसके लिए कई व्हाट्सएप ग्रुप, दिल्ली प्रोटेस्ट सपोर्ट ग्रुप (DPSG) और जामिया अवेयरनेस कैंपेन टीम का जिक्र किया गया।

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