March 26, 2026

अब मछली बताएगी आयुर्वेदिक दवाओं की ताकत:कम खर्च-तेज रिजल्ट के कारण जेब्राफिश पहली पसंद, जयपुर के राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में चल रहा रिसर्च

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चूहा, बंदर और खरगोश के बाद अब जेब्राफिश दवाओं के परीक्षण के लिए इस्तेमाल की जा रही है। दावा है कि देश में सबसे पहले आयुष शिक्षण संस्थान के रूप में राजधानी जयपुर के राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान ने आधुनिक प्रयोगशाला स्थापित कर जेब्राफिश पर आयुर्वेदिक दवाओं के परीक्षण की शुरुआत की है। जेब्राफिश से रिसर्च की स्पीड और एक्यूरेसी में बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। संस्थान का कहना है कि आयुर्वेद हजारों सालों के अनुभव पर आधारित है, लेकिन ग्लोबल लेवल पर आयुर्वेदिक दवाओं की स्वीकार्यता बढ़ाने और सटीक वैज्ञानिक डेटा हासिल करने के लिए दवाओं को लेकर रिसर्च जारी है। इस कड़ी में अब जेब्राफिश पर आयुर्वेदिक दवाओं का प्री-क्लीनिकल ट्रायल किया जा रहा है। सिलसिलेवार समझिए, जेब्राफिश मछली क्यों बनी पसंद… जेब्राफिश क्या है और इसे क्यों चुना
जेब्राफिश एक छोटे साइज वाली मीठे पानी की मछली है। इसका वैज्ञानिक नाम Danio rerio है। करीब दो इंच तक इसकी लंबाई होती है। आयुर्वेदिक दवाओं की प्री क्लीनिकल ट्रायल के लिए जेब्राफिश के चयन के कई कारण हैं। इंसान और जेब्राफिश के बीच जेनेटिक समानताएं हैं। इंसानों और जेब्राफिश के जीन 70 फीसदी तक समान होते हैं। इसके भ्रूण पारदर्शी होते हैं। इससे रिसर्च करने वाले माइक्रोस्कोप के जरिए यह देख सकते हैं कि दवा मछली के हृदय, मस्तिष्क या अन्य अंगों पर कैसे काम कर रही है। जेब्राफिश का तेजी से डेवलपमेंट, समय और लागत कम
जेब्राफिश का अन्य जीवों के मुकाबले तेजी से डेवलपमेंट होता है। जेब्राफिश के अंग 24 से 48 घंटों के अंदर विकसित होने शुरू कर देते हैं। यह एक साथ 100 से अधिक अंडे देती है। चूहों और अन्य जीवों पर परीक्षण करने में समय ज्यादा लगता है, जबकि जेब्राफिश पर परीक्षण कुछ ही दिनों में पूरा हो जाता है। चूहों या बंदरों की तुलना में जेब्राफिश का रख-रखाव काफी सस्ता होता है। इन्हें कम जगह में बड़ी संख्या में पाला जा सकता है। इन पर प्रयोग करना कम जटिल माना जाता है। प्री-क्लिनिकल ट्रायल क्या होता है
दुनिया में किसी भी नई दवा को बाजार में लाने से पहले दो चरणों से गुजरना पड़ता है। पहला है प्री-क्लिनिकल ट्रायल और दूसरा है क्लिनिकल ट्रायल। प्री-क्लिनिकल ट्रायल किसी भी दवा के रिसर्च का पहला चरण है। ये ट्रायल पहले जीवों पर यानी चूहों, खरगोश, बंदरों या जेब्राफिश पर किया जाता है। इसमें दवा से अंगों के डेवलपमेंट, नुकसान, सुरक्षित खुराक को देखा जाता है। जब प्री-क्लिनिकल ट्रायल में दवा सुरक्षित और प्रभावी पाई जाती है, तब इसे इंसानों पर टेस्ट किया जाता है। इसे क्लिनिकल ट्रायल कहा जाता है। कैसे किया जाता है ट्रायल
जेब्राफिश को खिलाकर या फिर इंजेक्शन के जरिए दवाओं का ट्रायल किया जाता है। राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में रस शास्त्र विभाग के एचओडी डॉ.अनुपम श्रीवास्तव ने बताया कि जेब्राफिश मॉडल बायोमेडिकल रिसर्च का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इस पर किए जाने वाले रिसर्च से मिलने वाली जानकारी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेषज्ञों को समझने एवं स्वीकार करने में सहायक होगी। उन्होंने दावा किया कि आयुर्वेद में देशभर में राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में सबसे पहले इसकी शुरुआत की गई है। अब धीरे धीरे अन्य संस्थानों में भी इसकी शुरुआत की जा रही है। उन्होंने बताया कि चूहों और अन्य जीवों की तुलना में जेब्राफिश पर ट्रायल काफी सस्ता रिसर्च का माध्यम है। एमडी-पीएचडी स्कॉलर को किया जा रहा प्रेरित
आयुर्वेद की अलग-अलग दवाओं के प्री-क्लिनिकल टेस्ट के लिए राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान के एमडी और पीएचडी स्टूडेंट्स को जेब्राफिश के उपयोग करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। हाल ही में एक स्टूडेंट स्पर्म जनरेट करने को लेकर जेब्राफिश पर एक प्रोजेक्ट कर रहा है7 इसके अलावा राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में जेब्राफिश पर कई दवाओं का ट्रायल चल रहा है। इनमें न्यूरो डिजनरेटिव डिसऑर्डर और क्रॉनिक डिजीज शामिल हैं। जेब्राफिश में जेनेटिक मॉडिफिकेशन करना भी आसान होता है।



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